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झोपड़-पट्टी का छोकरा

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prabhat

ऑफिस के लिए देर हो रही थी। कमबख्त, जरा देर हुई, की आधे दिन की तनखा कट। ऑफिस से आठ-दस कदम की दूरी पर था, की एक कालाकलूटा छोकरा मेरे सामने आकर खड़ाहो गया और एक रुपया मांगने लगा। पास की जोफाद-पट्टी का ही था, शायद।

मैं बुरी तरह से झुंजला गया। मगर लड़का था, की हार नि नही मान रहा था। हार कर, जेब से एक रुपया देना ही पड़ा। उससे पिंड छुडा कर, जल्दी से अपने ऑफिस की तरफ़ लपका। तीन-चार मिनट ही शेष बचे थे, नो बजने मैं।

अचानक, मन मैं जाने क्या हुआ, की मैंने पलट के उसकी और देखा। लड़के की आंखें खुसी के मरे चमक रही थीं। उसने मुझे पलते हुए देखा, तो खुशी से मेरी तरफ़ हात हिलाने लगा। मेरे होटों पर भी एक हलकी सी मुस्कान बिखर गयी।

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